आज आसमान खुल कर बरस रहा है। मुंबई के महलों और झोपड़ों में कोई भेदभाव नहीं करता। ज़रूरी हो कर भी आसमान का ये बरसता पानी छत की तलाश में भटकती माँ के लिए मुसीबत बन जाता है।

हिंदी कविता “बरसता आसमान”

क्या दुख है तुझे ओ आसमाँ?
बता दे मुझे तू आज
बारिश बन तेरे बहते आंसू
मन हो उठता है उदास।

सँभाल तू खुद को
रोक इन्हें बहने से।
देख वो माँ जा रही है
दो बच्चे हैं नन्हे से।

थाम खुद को कुछ देर तू
भागती माँ
पहुँच जाए बरगद के नीचे।

रो लेना फिर झूम कर
छाँव देने वाले बरगद को
आखिर
तेरे आंसू हीं सींचे।

थोड़ी दूर पर देख
तिरपाल बिछा है
झोपड़े की छत पर।
उसमें भी छेद है।
सब हैं हारे
तेरे बरसने की हट पर।

झोपड़े में कुम्हार
उसका ६ लोगों का परिवार।
बैठे हैं दुबक
झोपड़े के कोने में।

ठहर कुछ देर तू।
टपकती छत के नीचे
रख दे वो मिटटी का बर्तन।
फिर बूँद बूँद समेटेंगे
जब तू बरसेगा छम छम।

By नितेश मोहन वर्मा

भूल न जाए ये ज़माना। ऐ मौत तेरे आने से पहले, कुछ लफ्ज़ छोड़ जाऊँ किताबों में मैं। Exploring life, with some humor. Indian | Poet #HindiPoetry #शायरी #Poetry

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