भागता शहर

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भागता शहर, दो पहिये, चार पहिये । दैत्याकार वाहन । समय के चक्र जैसे दौड़ते पहिये। ये शहर नहीं रुकने वाला।

अकेलापन

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तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी और रोज़ी-रोटी की भागदौड़ में खुद के लिए समय निकल पाना मुश्किल हो जाता है। इन्सान के भीतर उसकी हर समस्या का हल छुपा होता है। लेकिन शोर इतना है की हम अपने अंतर्मन की आवाज़ सुन नहीं पाते। कुछ समय निकालिये। खुद से बात कीजिये।

बस अब बहुत हुआ

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गरीबों को ज्यादातर लोग या तो दया से देखते हैं या हिकारत से। कोई उनके लिए कुछ करना चाहता है तो कोई उनके होने की शिकायत करता है। हम ये भूल जाते हैं की गरीब होने का मतलब ये नहीं की वो मजबूर भी है या भूखा है। हर गरीब इंसान हमारे अनाज का भूखा नहीं है। उन्हें सम्मान चाहिए।

मेरी कविता

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जीवन के सफर में मशरूफ और मजबूर इंसान अपनी कई यादें पीछे छोड़ आता है। पीछे छूट गई ये यादें हीं हमारे जीवन का सार है। आईये अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ समय चुरा कर इन यादों से मुलाकात करते हैं।

सेव द टाइगर (Save The Tiger)

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भारत में बाघों की संख्या में २०१४ से २०१८ के बीच ३३% की वृद्धि हुई है। इससे बाघ संरक्षण (Save The Tiger) के प्रयासों को बल मिला है। २०१८ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बाघों की कुल संख्या २९६७ है। ये पूरे विश्व में बाघों की कुल संख्या (३१५९) का ८०% है। प्रयास जारी रहने चाहिए और हम सबको को इसका समर्थन कर लोगों में और जागरूकता लानी होगी।

थोड़ी सी उम्र बाकी है

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कवि अपनी प्रेमिका के इंतज़ार में अपना जीवन यूँ हीं व्यर्थ कर रहा है। वक़्त उसके लिए उसी मोड़ पर रुक गया जहाँ दोनों एक दुसरे से अलग हुए थे। इस हिंदी कविता “थोड़ी सी उम्र बाकी है” में वो अपने मन की व्यथा सुना रहा है।

बरसता आसमान

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आज आसमान खुल कर बरस रहा है। मुंबई के महलों और झोपड़ों में कोई भेदभाव नहीं करता। ज़रूरी हो कर भी आसमान का ये बरसता पानी छत की तलाश में भटकती माँ के लिए मुसीबत बन जाता है।

तेरा रूप

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इस कविता में कवि अपनी प्रेमिका के रूप का गुणगान कर रहा है। रूप वो नहीं जो उम्र के साथ ढल जाये। जो कभी मद्धम न पड़े, जिसकी कभी शाम न हो। कवि अपनी प्रेमिका के व्यावहारिक गुणों हुए और उसके नारीत्व का बखान कर रहा है।

मुलाकात

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इस कविता में कवि अपनी प्रेमिका से अपने निःस्वार्थ प्रेम का एहसास बयान कर रहा है। वो बताना चाहता है की कैसे उसका होना हीं कवि के जीवन को सार्थक बनता है।

आम का द्वन्द

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आम इंसान अपनी रोज़ी रोटी और घर परिवार में उलझा रह जाता है। देश और समाज के प्रति उसकी ज़िम्मेदारियों का एहसास स्वतः हीं दब दब कर अपनी पहचान खो देता है। लेकिन वक़्त और हालातों की पुकार उस एहसास को जगाने की निरंतर कोशिश करते हैं। ये कविता अपनी सांसारिक बेहोशी से जागे एक आम इंसान के द्वन्द की ललकार है।