आम का द्वन्द

climate sign outside blur
Photo by Markus Spiske on Pexels.com

नींद से जगा कर मुझे
ये किसने मेरा अभिनन्दन किया?
ये ठीक नहीं
ये अनुचित है।
जो हो रहा था
उसे होने देते।
मैं सो रहा था
मुझे सोने देते।

अब जो मैं जागा हूँ
नींद की बेहोशी से
मैं सवाल करूँगा।
जो सहमत न हुआ जवाब से
तो भूचाल करूँगा।

सोने से पहले
सब मेरा था।
सब मुझसे था।
मैं कैसे इतना आम हो गया ?
भूमि मेरी
वायु मेरा
जल भी मेरा।
फिर कब और कैसे
बोलो मेरा नाम खो गया।
मैं कैसे
इतना आम हो गया।

अब जो मुझे जगा दिया है
कैसे मैं चुपचाप रहूँ ?
बिना किये संघर्ष
कैसे ये हालात सहूँ ?

तो सोच लिया मैंने
और हो गया फैसला।
संघर्ष का ये आरम्भ है।
तेज़ कदम है
मुट्ठी बंद है।

तेज़ कदम है
मुट्ठी बंद है।
फिर से ख़ास बनना है
आम का ये द्वन्द है।

फिर से ख़ास बनना है
आम का ये द्वन्द है।

By नितेश मोहन वर्मा

भूल न जाए ये ज़माना। ऐ मौत तेरे आने से पहले, कुछ लफ्ज़ छोड़ जाऊँ किताबों में मैं। Exploring life, with some humor. Indian | Poet #HindiPoetry #शायरी #Poetry

2 comments

Leave a Reply