मैं जी लूँगा अब यूँ गुमनाम हो कर।
कोई पूछ न पाए मुझसे
तेरे जाने की वजह।


मेरी तरह
शाम भी रोज़ आती है।
मुझे तेरी,
उसे रात की आस होती है।
रात आती है
रोज़।
तुम नहीं आते।
मेरे गम में,
शाम भी उदास होती है।


बहुत वक़्त गुज़र गया
ज़ख्म मेरा भर गया।
इक टीस अभी भी बाकी है
कुछ दर्द सा अब भी होता है।
एहसास ख़त्म न हो शायद
एक रिश्ता था
वो मर गया।

By नितेश मोहन वर्मा

भूल न जाए ये ज़माना। ऐ मौत तेरे आने से पहले, कुछ लफ्ज़ छोड़ जाऊँ किताबों में मैं। Exploring life, with some humor. Indian | Poet #HindiPoetry #शायरी #Poetry

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