न छत की दरकार
न खिड़की न दीवार
खामोश रातों में
सूनी राहों में
इनका बसेरा होता है

रोज़ होते हैं
बेघर
जाने क्यों
सवेरा होता है

By नितेश मोहन वर्मा

भूल न जाए ये ज़माना। ऐ मौत तेरे आने से पहले, कुछ लफ्ज़ छोड़ जाऊँ किताबों में मैं। Exploring life, with some humor. Indian | Poet #HindiPoetry #शायरी #Poetry

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