मदनगीरी से चाँदनी चौक तक का सफर आज ज्यादा लम्बा लग रहा है। कल भी कुछ ऐसा हीं था। परसों भी।

उसके पह्ले तक ये सफर सुहाना हुआ करता था।    

पिछले तीन महीनों से समीर सवेरे ७ बजे ही शर्मा जी की चाय की टपरी के बाहर खड़ा हो जाया करता था। जैसे ही रेशमी पास के बस स्टॉप से ७:३० बजे की बस नंबर १०३ में चढ़ती थी, समीर दौड़ कर बस पकड़ लिया करता था।

उसके बाद के अगले डेढ़ घंटे वो बस बस में बैठी रेशमी को निहारा करता।

शाँत रहने वाली रेशमी। सादा रूप और सीधा व्यवहार। अपने में ही गुम रहना। मानो पूरी बस में वो अकेली हो। पीले रंग से शायद ज्यादा लगाव था उसे। कभी पीली कुर्ती, कभी पीला दुपट्टा। कभी पीली काँच की चूड़ियां,कभी पीली बिंदी। जूतियों की कढ़ाई में निखार भी पीले रंग का था।

क्या पता खुद में ही खोये रहने वाली रेशमी का कभी समीर पर ध्यान गया या नहीं।

क्या हुआ होगा? क्या रेशमी बीमार है?  या शायद वो कहीं शहर से बाहर गयी होगी । कहीं उसने नौकरी तो नहीं छोड़ दी?

ऐसे बहुत से सवाल आज समीर को परेशान कर रहे थे। सोच में डूबे समीर को कंडक्टर ने आवाज़ दी। समीर अनमने ही बस से उतर गया। आज उसके पैर उठ नहीं रहे थे।

एक पल के लिए समीर रुक सा गया। गहरी सोच में था। फिर अचानक से एक अजब सी फुर्ती आ गयी शरीर में। वो लपक कर पास की रिक्शा स्टैंड पर गया। बिना कुछ पूछे ही रिक्शा में बैठ बोला – “मदनगीरी चलो”।

मदनगीरी के बस स्टॉप पर रिक्शा से उतर समीर चाय वाले शर्मा जी के पास पहुंचा।

“अरे बऊआ…. आज ऑफिस नहीं है क्या?”

“छुट्टी ले ली चाचा। एक चाय पिलाइये….”

चाय की दो चुस्कियां ले कर समीर बोला –

“अच्छा चाचा, वो यहां से रोज़ ७:३० बजे एक लड़की बस पकड़ती थी…. १०३ नंबर। पहचानते हो क्या?”

“अरे बऊआ, बड़ा ही दिल दुखता है सोच कर…..”

“क्यों, क्या हुआ?”

“तुमने नहीं सुना क्या…… लटक गयी बेचारी।”

चाय पीते पीते समीर का जैसे गला सूख गया। ये चाचा ने क्या बोल दिया?  चाय और ज़िन्दगी दोनों जैसे एक पल के लिए बदरंग हो गए।

“अब किस्मत का क्या बऊआ…… अकेली थी बेचारी। बाप तो कब का चला गया। माँ भी एक साल पहले चल बसी।”

“और कोई नहीं था क्या घर में चाचा?”

“सुना तो था की एक भाई है…… आवारा था। कभी यहाँ, कभी कहीं।”

“लेकिन हुआ क्या चाचा…… ऐसे अचानक से? मतलब देखने में तो…. “

“हम क्या बतायें…… तुम लोग पढ़े लिखे हो बऊआ….. सुना है किसी से कुछ बोलती नहीं थी। कोई होना भी तो चाहिए बोलने सुनने वाला। वो मौसी है न, दरजी की दुकान पे?”

“हाँ है तो। मौसी का क्या?”

“अरे मौसी का क्या?  बता रही थी माँ के गुजरने के बाद से एकदम अकेली रह गयी थी। अब क्या जाने मन में क्या था बेचारी के?  कहीं कोई ऊंच नीच हुई तो…… नौकरी पेशा की भी परेशानी होती है बऊआ।”

“हाँ चाचा……” समीर अब न कुछ सुन रहा था और न कुछ बोलते बन रहा था।

शर्मा जी बोलते गए – “अब किसी का क्या भरोसा बेटा, कोई खुश नहीं है। किसी को पैसे की तकलीफ…… किसी को जोरू की। किसी को औलाद की परेशानी। घर पर सब ठीक तो ज़मीन, जायदाद, नौकरी। कोई साथ में बात करने वाला हो तो आदमी बात करे।”

शर्मा जी बाकी ग्राहकों में उलझ गए तो समीर उठ कर चल पड़ा। ये क्या हो गया उसके साथ? पीले रंग में सजने वाली वो सीधी सी लड़की यूँ ही चली गयी।

काश वो उससे बात कर लेता?

काश वो बता पाता की वो उसे पसंद करने लगा था? काश वो अपनी परेशानी बाँट पाती………………..

By नितेश मोहन वर्मा

भूल न जाए ये ज़माना। ऐ मौत तेरे आने से पहले, कुछ लफ्ज़ छोड़ जाऊँ किताबों में मैं। Exploring life, with some humor. Indian | Poet #HindiPoetry #शायरी #Poetry

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