झुमकी और उसके आईने की पक्की दोस्ती थी। जब झुमकी खुश होती, आईना भी मुस्कुराता। झुमकी की उदासी पे आईना भी मुर्झा जाता। लेकिन आज आईना बगावत कर रहा था। आज के प्रतिबिम्ब में क्रोध झलक रहा था।

झुमकी को वही खूबसूरती देखनी थी जो आईना कल दिखा रहा था। उसने बालों को सँवारा। चेहरे पे 70 रुपये की मेहंगी वाली क्रीम का लेप लगाया। भड़कदार लाल रंग की लिपस्टिक भी लगायी। लेकिन आईना टस से मस न हुआ।

झुमकी को कौन समझाये? मन की पीड़ा के जो भाव उसके चेहरे पे कम उम्र की झुर्रियाँ बन उभर आये थे, उन्हें उसका आईना भी अनदेखा नही कर पा रहा था।

आज झुमकी नही जायेगी। अगर कोई उसकी नही सुनेगा तो उसे भी कोई मजबूर नही कर सकता। आईने से मुँह फेर झुमकी बिस्तर पे जा बैठी। नही, वो आज टीवी भी नही देखेगी। वो सब झूठ बोलते हैं। फिल्में भी झूठ, फिल्मों के गाने भी झूठ। आज वो कुछ न देखेगी।     

लेकिन झुमकी से रहा न गया। दिन में ये एक हीं ऐसा मौका होता है जब झुमकी वाकई खुश होती है। रोज़ जब वो अमीना से मिलती है और अमीना उसे रंगीन किस्से सुनाती है। उन किस्सों में झुमकी खो जाती है। कुछ समय के लिए झुमकी अमीना बन जाती है। अमीना बन वो फरमाइशें करती है। अमीना बन वो शिकायतें करती है। अमीना बन वो रूठ जाती है। अमीना बन वो हंस लेती है, गा लेती है, नाच लेती है। अमीना बन वो प्रेम करती है।

झुमकी का ये अमीना बनना भी टीवी के उन फिल्मों और गानों की भाँती झूठ था। लेकिन ये झुमकी का झूठ था।

झुमकी ये झूठ जीना चाहती थी। अपने सच से ज्यादा।

By नितेश मोहन वर्मा

भूल न जाए ये ज़माना। ऐ मौत तेरे आने से पहले, कुछ लफ्ज़ छोड़ जाऊँ किताबों में मैं। Exploring life, with some humor. Indian | Poet #HindiPoetry #शायरी #Poetry

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