प्रिये सुधा

old man sending letters to dead wife
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जगजीवन बाबू को सेवानिवृत हुए ८ साल हो चुके हैं। २ साल पहले उनकी धर्मपत्नी सुधा का देहाँत हो गया था। एक बेटी है मेघा। वो शादी के बाद से ही अमेरिका में रहती है। उम्र के आख़री पड़ाव का अकेलापन अब काटने लगा है। जगजीवन बाबू अपने मन की व्यथा व्यक्त करने के लिए अपनी दिवंगत पत्नी को खत लिख रहे हैं।

“प्रिये सुधा,

तुम्हारे जाने के बाद बहुत अकेला हो गया हूँ मैं। तीन दिनों से किसी से बात तक नहीं हुई है। घुटने का दर्द बढ़ गया है। सुबह की सैर पर नहीं जा पा रहा। सारा दिन कभी बिस्तर पर, कभी खिड़की के पास कुर्सी लगा कर बैठा रहता हूँ।

कल मेघा को फ़ोन लगाया था। बात नहीं हो पायी। यहाँ सुबह होती है, वहाँ रात। और फिर उसका काम भी तो ऐसा है। फिर घर आ कर समीर और बच्चों को समय देना। अब पहले जैसी बात नहीं हो पाती मेघा से। ऐसे भी ज्यादा बातें तुम माँ बेटी किया करते थे। मैं तो बाप हूँ। कभी दोस्त नहीं बन पाया उसका।

दर्द कम होता है तो मैं किसी बहाने चला जाया करता हूँ। बैंक जा कर पास बुक अपडेट करवा लेता हूँ। बैंक का नया बाबू कभी कभी चिढ़ जाता है। कहता है हर हफ्ते अपडेट करवाने की क्या ज़रुरत है ? वो नए वाले मॉल भी गया था कई बार। इस दूकान से उस दूकान। वैसे एक चप्पल भी खरीदी मैंने। आरामदायक है। तलवे को आराम मिलता है। नए फैशन की है।

कहीं दूर जाने की अब हिम्मत नहीं होती। सोचता हूँ कुछ दिनों के लिए गाँव हो आऊँ। लेकिन अब ट्रेन का लम्बा सफर नहीं कर पाऊँगा। अब शायद जाना नहीं हो पायेगा। तुम थी तो साथ चलने की हिम्मत कर लिया करता था।

अच्छा आज तो चाय भी नहीं पी मैंने। दूध नहीं है। तीन दिन हो गये न बाज़ार गये। तुम भी बड़ा चिढ़ जाया करती थी कभी कभी। नाश्ते से पहले ही मैं तीन कप चाय पी लिया करता था।

अब इच्छा ख़त्म हो रही है सुधा। तुम्हारे जैसा साथी पा कर कभी नहीं सोचा था की यूँ अकेला रह जाऊँगा। इतना शोर और उसमें ये सन्नाटा।

काश तुम ये पढ़ पाती।

हमेशा तुम्हारा

जगजीवन”

दूसरी चिट्ठी – हैप्पी बर्थडे सुधा

By नितेश मोहन वर्मा

भूल न जाए ये ज़माना। ऐ मौत तेरे आने से पहले, कुछ लफ्ज़ छोड़ जाऊँ किताबों में मैं। Exploring life, with some humor. Indian | Poet #HindiPoetry #शायरी #Poetry

5 comments

      1. सच में life cycle अपनी अंतिम अवस्था में जैसे जैसे पहुँचता है वो फिर उस शुरुवाती दौर के समीप होता है जहां फिर उसे सहारे की जरूरत होती है ठीक उस बच्चे की तरह जिसे हर बात पर चलने खाने नहाने पढ़ने सब मे माँ पिता या घर के अन्य सदस्यों का सहारा आवश्यक होता है।
        आपकी रचना के बुजोर्गों की व्यथा है क्यों कि परिवार combined नहीं हैं आज। पहले बड़े परिवार में बुजुर्गों को हम उम्र साथ मिल जाता थाऔर छोटे बच्चों में भी दादा दादी नाना नानी मगन रहते थे।

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