भागता शहर

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भागता शहर, दो पहिये, चार पहिये । दैत्याकार वाहन । समय के चक्र जैसे दौड़ते पहिये। ये शहर नहीं रुकने वाला।

हैप्पी बर्थडे सुधा

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तुम मानोगी नहीं लेकिन आज गज़ब की स्फुर्ती है शरीर में। घुटना बोल रहा है जगजीवन बाबु जाईये दौड़ आईये। आखिर हमारी सुधा का बर्थडे है। यहीं तो है मेरा वेलेंटाइन। याद है तुम कैसे शर्मा जाती थी। मेघा देख लेगी, मेघा सुन लेगी। यहीं रट लगा रखती थी। बाप हो गया तो क्या बीवी से प्यार करना छोड़ दूँ?

अकेलापन

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तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी और रोज़ी-रोटी की भागदौड़ में खुद के लिए समय निकल पाना मुश्किल हो जाता है। इन्सान के भीतर उसकी हर समस्या का हल छुपा होता है। लेकिन शोर इतना है की हम अपने अंतर्मन की आवाज़ सुन नहीं पाते। कुछ समय निकालिये। खुद से बात कीजिये।

प्रिये सुधा

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जगजीवन बाबू को सेवानिवृत हुए ८ साल हो चुके हैं। २ साल पहले उनकी धर्मपत्नी सुधा का देहाँत हो गया था। एक बेटी है मेघा। वो शादी के बाद से ही अमेरिका में रहती है। उम्र के आख़री पड़ाव का अकेलापन अब काटने लगा है। जगजीवन बाबू अपने मन की व्यथा व्यक्त करने के लिए अपनी दिवंगत पत्नी को खत लिख रहे हैं।

थोड़ी सी उम्र बाकी है

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कवि अपनी प्रेमिका के इंतज़ार में अपना जीवन यूँ हीं व्यर्थ कर रहा है। वक़्त उसके लिए उसी मोड़ पर रुक गया जहाँ दोनों एक दुसरे से अलग हुए थे। इस हिंदी कविता “थोड़ी सी उम्र बाकी है” में वो अपने मन की व्यथा सुना रहा है।

तेरे जाने की वजह

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“तेरे जाने की वजह” एक प्रेमी की कुछ पंक्तियों का संग्रह है। अपनी प्रेमिका से अलग होने के बाद, प्रेमी अब भी उसके इंतज़ार में है।

काश

शाँत रहने वाली रेशमी। सादा रूप और सीधा व्यवहार। अपने में ही गुम रहना। मानो पूरी बस में वो अकेली हो। पीले रंग से शायद ज्यादा लगाव था उसे। कभी पीली कुर्ती, कभी पीला दुपट्टा। कभी पीली काँच की चूड़ियां,कभी पीली बिंदी। जूतियों की कढ़ाई में निखार भी पीले रंग का था।