जात

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मैं ढून्ढ लूँगा अपना रब इंसानों में कहीं,
पत्थरों से मैं यूँ भी बात करता नहीं। इतना है खून बहा, इतनी है लाशें देखी । तलवारों से, हत्यारों से, अब मैं डरता नहीं।

समर्पण

तेरे अरमानों का कत्ल करता रहा,
तेरे समर्पण से खुद को मर्द माना। मर्दानगी का खोखला एहसास।

बेघर

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इनका कोई पक्का ठिकाना नहीं होता है। महानगरों में मेहनत मज़दूरी कर अपने परिवार का पोषण करने वाले ये मेहनतकश हर रोज़ बेघर होते हैं।